Mr. Sonu Sharma is the founder of DYNAMIC INDIA GROUP (INDIA). An Author, Educator, Business Consultant and a successful Entrepreneur, he is a much sought-after speaker.

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About Sonu Sharma

Mr. Sonu Sharma is the founder of DYNAMIC INDIA GROUP (INDIA). An Author, Educator, Business Consultant and a successful Entrepreneur, he is a much sought-after speaker.Today he is one of the Youngest Inspirational Speaker in India He inspires and encourages individuals to realize their true potential. He has taken his dynamic personal messages to opposite sides of the globe. His 18 years of research & understanding in Direct Sales Industry has put Many organizations on a path of growth and fulfillment.

PERSONAL DEVELOPMENT IS THE KEY TO SUCCESS

Income will not far exceed your Personal Development. Sometimes it take a lucky jump , If you do not work on your personal Development it will come back as you are.. Life has strange ways..The major question to ask on a job is not what are you getting , the major question to ask on a job is what are you becoming,True happiness is not contain in what you got, Happiness is contain in what you become, Success is looking for a good place to stay,Value makes the difference in Results,You can’t create more time but can create more value,1st lesson of Economics: We Primarily paid for Value we don’t get paid for the time.

  • जिंदगी में अपनी तुलना किसी से मत करना
  • Always take challenges in Your Life
  • You are the Product of your Habits
  • हनुमान जी से सीखें झुक के रहना !
 

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We are devoted to excellence and developing global leaders. And our global leadership is expanding with over 2 lac Live Audience , creating a hub for Leadership and research in India and new programming to strengthen India’s Corporate sector. Additionally, By attending our Executive Education programs, you and your team will have access to industry leaders, and a global network of top professionals. Attendees of our programs include senior-level executives in a range of industries and functions.

 

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11

Jan

Leadership Conclave in Surat

How to Achieve Growth after Pandemic...

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  • नेटवर्क मार्केटिंग

    नेटवर्क मार्केटिंग “Why do people fail?” लोगों के काम करने के तरीके में उनकी असफलता का सारा राज छिपा है। अगर आप गौर से उनके काम करने का तरीका देखें तो वह तरीका ही बता देगा कि वे फेल होने वाला ही काम कर रहे हैं। उनके काम करने के तरीके में ही उनकी असफलता का राज छिपा है, समझाता हूँ कैसे। आप बिजनेस से जुड़े है। जानते हैं पहला काम आपको क्या करना है? बिना लिस्ट बनाए लोगों को कॉल करना चालू कर दीजिये - ‘हैलो! नमस्कार, कैसे हैं आप?’ आपने अभी लिस्ट नहीं बनाई और काम करते ही, जुड़ते ही अभी पैसा दिया है। आपने अभी-अभी पहली सीढ़ी उतरी है और पहले व्यक्ति को फोन लगा कर पूछा है- ‘एक काम है, करेगा तू? मैंने एक काम किया है, क्या तू भी करेगा?’ अभी इसे पता ही नहीं है कि करना क्या है? लेकिन इसे लगता है कि इसे पता है कि क्या करना है। ध्यान दीजिए! लोगों के काम करने के तरीके में ही असफलता का राज छिपा है। आप लोगों को गौर से देखिए। लोगों के फेल होने के कारण इसलिए बता रहा हूँ कि आप जल्दी समझ जाएँ। मान लीजिये आपने किसी गेस्ट को कॉल किया और आपका सीनियर आपके गेस्ट को प्रजेन्टेशन दिखा रहा है। मान लेते हैं कि उनका नाम है मनोज कुमार। मेरे सीनियर मेरे साथ हैं जिनका नाम है प्रदीप कुमार है और मनोज जी मेरे गेस्ट हैं। मैं बिजनेस से जुड़ा, जुड़ने के बाद मनोज कुमार जी को प्रदीप कुमार जी के पास ले आया। अब जो भी काम था इन्होंने किया। प्रदीप जी ने इनको प्लान समझाने और डेमोनेस्ट्रेशन दिखाने चालू कर दिए। लोगों के फेल होने में उनके काम करने के तरीके का बहुत बड़ा रोल है। गौर से देखिए हो क्या रहा है बाजार में। आप छोटी-छोटी बातें नजरअंदाज करते हैं। छोटा सा छेद पानी के जहाज को डुबो देता है, छोटी सी चिनगारी जंगल की आग में बदल कर पूरे जंगल को राख कर सकती है; मूलतः छोटी-छोटी गलतियाँ बहुत बड़ा नुकसान कर देती हैं। टाइटैनिक में छोटी सी गलती की वजह से पन्द्रह सौ लोग डूब गए थे। अब जो दिखाना है उसके लिए चलिए ऐसा मान लेते हैं कि मैं बैठा हुआ हूँ और आप गेस्ट को प्लान दिखा रहे हैं, नॉर्मल डिस्कशन कर रहे हैं। इनका प्लान चालू है, एक इनके गेस्ट हैं और मैं हूँ होस्ट। यहाँ पर जब आप क्लाइंट से बात कर रहे हों तो आपको यह ध्यान रखना है कि आप उसे बार-बार यही दिखाएँ कि आपका काम कितना व्यस्त रखता है आपको और आपके पास क्लाइंटों की लाइन लगी पड़ी है। जैसे, ‘हाँ आज तो आया हूँ किसी काम से... प्लान चल रहा है इनका... बढ़िया... तू बता...।‘ ‘अच्छा! आ रहा हूँ सर, आ रहा हूँ... ठीक है... फिर देखते हैं क्या है।’ ध्यान दीजिये, एक्टिविटी देखिये मेरी। गौर करिए। फिर बैठ गया। ‘सर थोड़ा जल्दी बताओ... हमें जाना है...।’ आप ध्यान दीजिये मैं कैसे अपने सीनियर का हाल बेहाल कर रहा हूँ। गौर कीजिए, लोगों के काम करने के तरीके में उनकी असफलता का राज छिपा हुआ है। होस्ट जब वहाँ पर मौजूद है तो वो होस्ट वहाँ पर क्या कर रहा है। वो सेमिनार के बजाए सम कर रहा है। सेमिनार पर फोकस करने के बजाए सब एक्टिविटी कर रहा है; फेसबुक भी देख रहा है, व्हाट्सअप भी देख रहा है और कॉल भी अटेंड कर रहा है, इधर-उधर मुँह भी मार रहा है। वह अपने सारे काम कर रहा है। ऐसे में गेस्ट के दिमाग में एक ही बात डायरेक्टली जाती है कि यह सीरियस नहीं है। अब आप बोलेंगे कि ‘हम तो सीरियस हैं।’ लेकिन तुम्हारी एक्टिविटी बता रही है तुम नॉन-सीरियस हो। आप ध्यान से देखिए कि लोगों की असफलता बताएगी कि वो कौन-कौन सी हरकतें रोज करते हैं। अब ये छोटी-छोटी सी बातें हैं पर आप गौर नही फरमा रहे हैं। जो होस्ट गेस्ट को लेकर आया हो उसका रोल बिल्कुल अलग है। उसका बड़ा सिम्पल रोल है कि जब वह होस्ट और अपने सीनियर के साथ अपने गेस्ट को बिठा दे तो फोन को बंद कर के साइड में रख दे और सीनियर की बात सुने। आप प्लान दिखा रहे हैं और मैं बिल्कुल ध्यान से देख रहा हूँ, जैसे मैं पहली बार देख रहा हूँ। मेरा भी रोल है उस वक्त। खाली सीनियर का रोल नहीं। मैं सीनियर को ऐसे सुन रहा हूँ - ध्यान से - जैसे मैं पहली दफा सुन रहा हूँ। और जहाँ मुमकिन हो वहाँ नोट्स भी बना रहा हूँ, कोई फोन नहीं है। और अगर गलती से मेरे गेस्ट का फोन बज गया उसको कहें कि वह भी बाद में बात कर लें। मैं बहुत ध्यान से एक घंटा सुन रहा हूँ और बिल्कुल भी टोका-टाकी नहीं कर रहा हूँ। सीनियर को जवाब देने का मौका दिए बिना काम कर रहा हूँ। अगर आप कामयाब लोगों से नेटवर्क मार्केटिंग के बारे में बात करेंगे तो वो आपको बताएंगे कि लोगों के फेल होने का कारण उन्हीं की एक्टिविटी में छिपा है। आपका सीनियर जब आपके गेस्ट को बिजनेस प्रेजेंट कर रहा है तो आपका भी एक रोल है, पार्टीसिपेशन है, और आपका पार्टीसिपेशन ये है; जब मैं पाँच बार, दस बार, पन्द्रह बार प्लान देते हुए सुनूँगा, एक्सेप्ट करूँगा तो मुझे भी समझ में आएगा कि मुझे काम कैसे करना है। कल को ये सवाल पूछेगा और ये आन्सर देंगे, तो मुझे पता चलेगा कि ये सवाल पूछने पर ये आन्सर देना है। लेकिन अगर मैं फोन में ही व्यस्त हूँ तो मुझे समझ ही क्या आएगा कि क्या कन्वर्सेशन हुआ। ये जुड़ भी गया, मैंने पैसे कमा भी लिये, पर सीखा क्या? जिन्दगी भर अपाहिज बनकर अपने सीनियर के आगे-पीछे घूमता रहूँगा कि ‘बाबूजी समझा दो’। छः महीने के बाद भी आपको प्लान दिखाना नहीं आया। आप में भी होंगे ऐसे बहुत से कलाकार। एक साल के बाद भी सीनियर को बोलते हैं, ‘मेरे दो गेस्ट हैं, प्लान दिखा दोगे आप?’ अगर अपने सीनियर को दस बार प्लान देते हुए सुनते, दो-चार बार नुकसान उठाते, पर दस बार के बाद शायद सीनियर की जरूरत ही नही पड़ती। प्रॉब्लम को प्रॉब्लम की तरह देखिये, सारा का सारा दारोमदार उस आदमी का होता है जो गेस्ट लाया है। कम्पनी सबके लिए बराबर है। प्रोड्क्टस सबके लिए बराबर हैं। सीनियर सबके लिए बराबर है। जो फेल हो रहा है उसके लिए वह खुद जिम्मेदार है और कोई नहीं। उसकी एक्टिविटी गड़बड़ है। वह कभी-कभी गेस्ट को सेमिनार में लेकर आता है। अब सेमिनार क्या? बैठा तो है गेस्ट, अब जब सेमिनार में प्लान चल रहा है ना, तो बीच-बीच में कुछ और भी बात कर रहा है उससे- ...‘‘आज चलेंगे फिल्म देखने... और फिर बैठना भी है। ये खत्म हो जाए तो अब चलते हैं।’’ याद रखिये, जितनी देर आप गेस्ट के साथ रहो, धंधे के अलावा कोई और बात ना करना। अगर वह कहीं और डाईवर्ट हो भी गया है बातों में, तो उसे पकड़ कर वापस ले आना धंधे में। लीडरशिप होना बहुत बड़ी बात है। वो कह रहा है कि ‘‘कल ऐक्सीडेंट हो गया था।’’ लेकिन यह सही है कि ये जबरदस्त ऐक्सीडेंट है जिन्दगी का जो हमारे साथ तीन दिन पहले हुआ। और वह है एमएलएम! वो कोई भी टॉपिक छेड़ रहा है आप घुमा कर उसको वापस धंधे में लेकर आओ। तुम्हारा उल्टा है। वो कह रहा है कि ‘‘आज मौसम बहुत बढ़िया है...’’ तो तुम तो इंतजार में ही हो कि ‘आज शाम को खोलेंगे, भाई’। उसके लिए तो यह बिजनेस एक्सपेरीमेंट के तौर पर हो रहा है। चला तो चला, ना चला तो कौन सी जायदाद ले गया। 15 लगे, सूट ले आए, भाड़ में जाए कम्पनी, फिर बाद में लोग बोलते हैं कि हम फेल हो गये। कौन कारण है? यू आर फ्लॉप। इसका बुनियादी कारण मैं आपको समझाने की कोशिश करता हूँ। लोग ट्रेनिंग में आ रहे हैं, पैसे खर्च कर रहे हैं, अपना आज इन्वेस्ट कर रहे हैं, मगर वो सीरियस नहीं हैं। आप बोलेंगे कि ‘‘हम तो बहुत सीरियस हैं।’’ सुनना, समझना, आत्मसात करना और इम्पलीमेंट करना ये चारों अलग-अलग बातें हैं। मैं जब इस बिजनेस में आया तो सिखाने वाला कोई नहीं था, मैं अकेला था। बहुत छोटी सी कम्पनी थी, लोग मुझसे पूछते हैं कि मैंने कैसे कर लिया। अभी भी पूछते हैं कि मेरी पहली साल की इन्कम एक करोड़ रुपये कैसे थी। जी हाँ! मेरे पहले साल का सर्टीफिकेट, साल 2006-2007 का 1 करोड़ 2 लाख रुपये था। पहले 6 महीने की इनकम, 15 लाख रुपये थी, चाथे महीने में लिमिट में थी। ये तब जब नेटवर्क मार्किटिंग के बारे में कुछ किसी को पता ही नहीं था, इतनी नकारात्मकता थी, कम्पनी छोटी थी। लोग कहते थे - ‘‘चलेगी नहीं, तुम भाग जाओगे।’’ ये सब फालतू फंड की ड्रामेबाजी चलती थी। इन सब के बावजूद मुझे एक साल में 1 करोड़ मिला। लोग आज तक हैरत में हैं कि ‘तुमने कैसे कर लिया, तुम्हें क्या आता था?’ मैंने बोला, ‘‘कुछ नहीं आता था इसलिए कर लिया, आता होता तो कर नहीं पाते।’’ लेकिन सच में स्टूडेंट की तरह इस बिजनेस को समझा, और स्टूडेंट की तरह इस बिजनेस में काम किया। इस बिजनेस में बहुत पैसा है अगर तुम सीरियसली इस बिजनेस में काम करो। लेकिन अगर हँसी मजाक करोगे, मसखरी करोगे, तो ये तुमको चार दिन में उड़ा देगा। जिन्दगी देती नहीं, लौटाती है। मैंने पहले भी कहा था, जो दोगे, पलट के, लौटा के सूद समेत वापिस करेगा। मैं आपके सामने जीता जागता उदाहरण हूँ जो इसी मेसेज को दे रहा हूँ, इसी धरती पर काम कर रहा हूँ, इसी दिल्ली में कर रहा हूँ। मेरा यही कहना है कि सिर्फ सुनो मत, अमल करो।   .

  • चेन बनाने वाला बिजनेस

    चेन बनाने वाला बिजनेस समझाने की कोशिश करता हूँ। आसान सी बात है - “If you want to become rich, find someone rich and do what he is doing then one day you will be rich too”. ये कहा है जेफ गेटी ने। ये समझने के लिए कोई पीएचडी करने की जरूरत नहीं, कोई एमबीबीएस होने की जरूरत नहीं है, कोई एमडी होने की जरूरत नहीं है। सिंपल फिलॉसफी है, आगे बढ़ने के तरीके सिंपल हैं घुमावदार नहीं। लेकिन सिम्पल तरीके समझना मुश्किल होता है। जेफ गेटी कहते हैं अगर आप पैसा कमाना चाहते हैं तो किसी ऐसे आदमी को देखें जो पैसा कमा रहा है। वह करें जो वह कर रहा है और एक दिन आपके पास भी पैसे आने शुरू हो जाएंगे। आसान है, इसको समझने के लिए पीएचडी की जरूरत नहीं। याद कर लीजिये - If you want to become rich, find someone rich and do what he is doing, then one day you will be rich too. एक दिन आपके पास भी वही सम्पन्नता होगी जो उसके पास है। जेफ गेटी यह भी बोलते हैं- ‘‘मैं 100 लोगों से 1-1 प्रतिशत काम कराना पसंद करता हूँ, बजाय इसके कि मैं 100 प्रतिशत काम करूँ।’’ यहाँ पर शुरू होती है नेटवर्क मार्केटिंग। ऊपर वाले कोट को लेकर चलते हैं If you want to become rich, find someone rich. देखिये अमीर लोग क्या करते हैं। अच्छा मुझे बताओ यह देश किसका है? और पत्नी किसकी है? यही प्रॉब्लम है तुम्हारी। देश तो हमारा है और पत्नी मेरी है। अच्छा मैंने पूछा ‘‘देश किसका है?’’ आपने बोला ‘‘हमारा’’। ‘‘पत्नी किसकी?’’ ‘‘मेरी’’। ‘देश मेरा है’ ऐसा एक ने भी नहीं कहा सिर्फ पांच सात लोगों को छोड़कर। क्यों मुंह से क्यों नहीं निकला? यही सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। लेकिन अभी इसकी जड़ में जाने का समय नहीं है। सतह पर बात करते हैं। नेटवर्क मार्केटिंग में इसे कहते हैं ओनरशिप लेना। दोस्तों, लीडर्स इस बिजनेस में ओनरशिप नहीं ले पाते। उनको हमेशा लगता है यह बिजनेस किसी और का है। उन्हें लगता है यह बिजनेस मेरे अपलाइन का है। उन्हें लगता है यह बिजनेस कंपनी का है उसे कभी लगता नहीं यह बिजनेस मेरा है। मैं आपको बताना चाहूंगा 14 सितंबर 2005 को मैं इस बिजनेस में आया और मेरी टीम में एक व्यक्ति एसोसिएट हुआ और मैं उसी दिन से अपने आप को अपलाइन समझ रहा हूँ। मैंने अपने आप को डाउनलाइन कभी समझा ही नहीं। मुझे लगा कि एक भी व्यक्ति अगर जुड़ा है तो मैं अपलाइन हो गया हूँ। ऊपर की तरफ नहीं देखा नीचे की तरफ देखने की कोशिश की, बस। मुझे पता था कि सारा काम मुझे खुद को करना है, सेमिनार भी खुद करना है, ट्रेनिंग भी खुद करनी है, प्रोस्पेक्टिंग भी खुद करनी है क्योंकि मुझे पता था यह बिजनेस मेरा है। इसे बोलते हैं ओनरशिप। एक किस्सा सुनिए, एक लिमोजिन कार आकर रुकी और एक मजदूर वहाँ काम कर रहा था। लिमोजिन का दरवाजा खुला तो अन्दर से किसी ने बोला, ‘‘स्टीव कम इन साइड।’’ (स्टीव तुम अंदर आ जाओ)। स्टीव अंदर आया तो अंदर था जॉन जो उसकी कंपनी का प्रेज़िडेंट था। स्टीव तो मजदूरी करता था। ईंट उठा रहा था। जॉन ने स्टीव को लिमोजिन में बिठा लिया। अंदर उसने उसको कोल्डड्रिंक पिलाई, जूस पिलाया। टॉवल से उसका चेहरा साफ किया। आधे घंटे तक दोनों की डिस्कशन हुई। दोनों दोस्त थे। जब आधे घंटे बाद लिमोजिन का दरवाजा खुला और स्टीव उतरा तो वह फिर से ईंट ढोने के काम में लग गया और जॉन की लिमोजिन वहां से निकल गई। अब स्टीव के दोस्तों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने बोला, ‘‘स्टीव! तुम्हारा दोस्त प्रेज़िडेंट?’’ उसने बोला, ‘‘हाँ, मेरा दोस्त है। हम 25 साल पहले एक ही कंपनी में काम करते थे। आज वह कहाँ है, मैं कहाँ हूँ?’’ उसने बोला, ‘‘पहले हम जिस कंपनी के लिए काम करते थे वहाँ मैं 1 घंटे में 200 रुपये कमाने के लिए काम करता था। मैं यह सोचता था मेरे पास इस घंटे में 200 कैसे आएंगे और वह सोचता था ‘मैं अब बड़ा आदमी कैसे बनूंगा’। दोनों की थिंकिंग में जमीन-आसमान का फर्क था। आज वह लिमोजिन में है और मैं आज भी मजदूर हूँ।’’ इससे आप कुछ समझे? मैं आपको एक और उदाहरण दूंगा तो आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे और यह सच्ची घटना है। सिविल सर्विसेस से दो लोग रिटायर हुए। दोनों ने एक साथ वॉलंटरी रिटायरमेंट ली। पहले व्यक्ति ने रिटायरमेंट लेने के बाद अपना बिजनेस सेट अप किया। बिजनेस के लिए उसने मेहनत की और वह चल पड़ा और उसकी कम से कम 200-250 करोड़ का टर्नओवर करने वाली कंपनी बन गई। एक दिन अचानक उसके पास इंटरव्यू के लिए एक आदमी आया। यह वही दूसरा व्यक्ति था जो सिविल सर्विसेज में उसके साथ काम करता था। उसने भी उसी वक्त वीआरएस ले लिया था। पहले ने दूसरे को पहचान लिया। वह बोला, ‘‘अरे! तू कैसे?’’ दूसरे ने कहा, ‘‘मैं तो जॉब कर रहा था कहीं। वहाँ से मामला गड़बड़ हो गया। अब इंटरव्यू दे रहा हूँ।’’ ‘‘हम तो एक साथ सिविल सर्विस में थे,’’ पहले ने कहा। दूसरे ने भी बोला, ‘‘हाँ, हाँ, एक साथ सिविल सर्विसेज में थे।’’ पहले ने दूसरे को नौकरी पर रख लिया। महीने - दो महीने बीत गए दूसरे को पहले की नौकरी करते-करते। दो महीने के बाद एक दिन जब सब चले गए तो एम्प्लायी ने अपने एम्प्लायर से - जो उसका मालिक था - कहा, ‘‘तुम्हें याद है 25 साल पहले हम एक साथ थे। तुम भी 2000 रुपये महीना कमाते थे और मैं भी 2000 रुपये महीना कमाता था। तब तुम भी नौकर थे और मैं भी नौकर था। हम दोनों नौकरी करते थे। आज तुम इस कंपनी के मालिक हो और मैं नौकर हूँ। कितने लकी हो।’’ उस आदमी ने बोला, ‘‘यह सच है कि मैं इस बारे में तुझसे बात करना नहीं चाहता था लेकिन तूने छेड़ दी है तो आज सुन। 25 साल पहले हम दोनों एक ही जगह काम करते थे। हम दोनों ही 2000 रुपये कमाते थे। तू तब भी नौकर था और आज भी नौकर है। मैं तुझे 25 साल पहले का एक वाकया सुनाता हूँ। एक दिन तू और मैं ऑफिस में से साथ निकले थे घर जाने के लिए। तुझे याद होगा रास्ते में जब हम एक-डेढ़ किलोमीटर पैदल चले आ रहे थे क्योंकि वहीं हमारा मेस था जहाँ हम जा रहे थे। और जब हम एक-दो किलोमीटर चल लिये तो मुझे अचानक याद आया और मैंने तुझसे कहा कि हम अपने कमरे का पंखा और लाइट चलता छोड़ आए हैं। तो चल कर उसको बंद कर देते हैं। तूने मुझसे कहा था कि ‘2 किलोमीटर वापस जाएंगे, 2 किलोमीटर फिर आएंगे, 4 किलोमीटर हो जाएंगे। 2 घंटा लग जाएगा। क्या फर्क पड़ता है?’ तू नही गया था। मैं गया था। लाइट बंद करके आया था। मैं तब भी मालिक था मैं आज भी मालिक हूँ। मैं तब भी खुद को मालिक समझता था। कर मैं नौकरी ही रहा था लेकिन मैं अपने आप को ओनर समझता था और मैं आज भी ओनर हूँ।’’ उसने आगे कहा, ‘‘तेरी जो फिलॉसफी है, तेरी जो थिंकिंग है वो तब भी एक एम्प्लायी की थी, आज भी एम्प्लायी की है। तूने अपनी थिंकिंग कभी चेंज नहीं की तो तू जिंदगी भर एम्प्लायी ही रहने वाला है।’’ It’s called taking ownership, my dear friend. दोस्तों, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि सभी एम्प्लायी के लिए कम्पनी एक ही होती है। 1 जोड़ी 1000 रुपये, 2 जोड़ी 2000। 15770 में दो सूट मिलते हैं यह आप भी बताओगे मैं भी बताऊंगा। 14720 में तीन शर्ट 3 ट्राउज़र, यह आप भी बताओगे, मैं भी बताऊंगा। 11760 में 13 टाई आप भी बताओगे, मैं भी बताउगा। 5690 में कॉस्मेटिक, आप भी बताओगे मैं भी बताऊंगा। 14000 में साउंड सिस्टम, आप भी बताओगे, मैं भी बताऊंगा। आप में और मेरे में डाटा एक ही है। सब के पास जो डाटा है वह सब एक ही जैसा दे रहे हैं। लेकिन रिजल्ट में जमीन-आसमान का फर्क है। और इसी दिल्ली के अंदर डाटा डिलीवर हो रहा है। आप में से भी वही डिलीवर हो रहा है और मेरे मुंह से भी। सफल लोगों के मुंह से भी डाटा वही डिलीवर हो रहा है और असफल लोगों के मुंह से भी। किसी का पेआउट शानदार है, किसी का शानदार नहीं है। जिसका भी शानदार है एक बात तो तय है उसने बिजनेस के लिए ओनरशिप ले रखी है। उसे पता है यह बिजनेस मेरा है। जब मेरा होता है तब कंप्लेन खत्म हो जाती है। जब ‘मेरा’ का भाव होता है तो सजेशंस बढ़ जाते हैं, कंप्लेन बिल्कुल एलिमिनेट हो जाती है। मेरा होने के बाद आप इधर-उधर कंप्लेन नहीं करते। कभी प्रॉब्लम आती है तो उसको रफू करने की कोशिश ज्यादा होती है। लेकिन जब ‘मेरा’ का भाव नहीं होता, तब कंप्लेन होती है और फिर बहुत सारे नाटक होते हैं, यह ऐसा हो गया, वह वैसा हो गया। यह ठीक नहीं हुआ। हॉलिडे बंद कर दिया तुमने। एक आदमी आया मेरे पास बोला, ‘‘सर, हॉलिडे बंद हो गया।’’ मैंने कहा, ‘‘वाह! कहाँ थे अब तक? जब तक चल रहा था तब 6 महीने में तूने कितना बेचा था? चल वापस शुरू कर देता हूँ। अगले 6 महीने में कितना बेचेगा?’’ वह बोला, ‘‘नहीं, मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था क्या बंद हो गई होलीडे?’’ एक्सक्यूज देखो। जब गोल सेट होते हैं और विजन सेट होता है तो फिर परफॉर्मेंस निकलती है। जब गोल भी नही होते और विजन भी नहीं होता है तब बहानेबाजी होती है, नाटकबाजी होती है, ड्रामे होते हैं और एक्सक्यूज निकलते हैं। बहुत पुरानी घटना है- रात को एक लड़का क्रिकेट खेल कर आया। वह दिल्ली कर्नाटक के बीच रणजी का मैच का खेल कर आया था और 40 नॉट आउट था। घर पहुँचा, सो गया। अगले दिन उसे फिर खेलना था। टीम संकट में थी। रात को ढाई बजे माँ ने जगाया, ‘‘उठ, तेरे पापा गुजर गए।’’ उसने अपने कोच को कॉल लगाया। कोच सिडनी में था। लड़के ने पूछा, ‘‘सर, मैं क्या करूं?’’ कोच बोला, ‘‘देख; लाइफ तेरी है। पिता तो नहीं रहे लेकिन जहाँ तुझे जाना है वह मौके बार-बार नहीं मिलेंगे।’’ अगले दिन वह लड़का सुबह ग्राउंड में गया। 90 प्लस स्कोर किया। टीम को संकट से बाहर निकाला और जाकर फिर क्रिमेशन ग्राउंड में अपने पिता का संस्कार किया। यह लड़का आज आपकी क्रिकेट टीम का कप्तान है। विराट कोहली की बात कर रहा हूँ। कोई बहाना नहीं है, कोई एक्सक्यूज नहीं है : आज जुकाम है; आज हमारे नल में पानी नहीं आ रहा, तो प्लंबर का काम हम करेंगे। ये सब वाहियात बहाने हैं। करेक्टर बिल्डिंग इम्पोर्टेंट है दोस्तों। अगर यह बिजनेस हम अच्छे से कर सकेंगे तो इसके पीछे बहुत बड़ा काम है। तो यह बिजनेस किसका है दोस्तों? 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  • एक बार नारायण; जिन्हें हम भगवान विष्णु भी कहते हैं; ने सोचा कि वो…

    एक बार नारायण; जिन्हें हम भगवान विष्णु भी कहते हैं; ने सोचा कि वो अपने इष्ट देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने के लिए उन्हें एक हजार कमल के पुष्प अर्पित करेंगे. पूजा की सारी सामग्री एकत्रित करने के बाद उन्होंने अपना आसान ग्रहण किया. और आँखे बंद कर के संकल्प को दोहराया. और अनुष्ठान शुरू किया. यथार्थ में शिव जी के इष्ट नारायण है, और नारायण के इष्ट शिव जी है. किन्तु आज इस क्षण भगवान शंकर भगवान की भूमिका में थे और भगवान नारायण भक्त की. भगवान शिव शंकर को एक ठिठोली सूझी. उन्होंने चुपचाप सहस्त्र कमलो में से एक कमल चुरा लिया. नारायण अपने इष्ट की भक्ति में लीन थे. उन्हें इस बारे कुछ भी पता न चला. जब नौ सौ निन्यानवे कमल चढ़ाने के बाद नारायण ने एक हजारवें कमल को चढ़ाने के लिए थाल में हाथ डाला तो देखा कमल का फूल नहीं था. कमल पुष्प लाने के लिए न तो वे स्वयं उठ कर जा सकते थे न किसी को बोलकर मंगवा सकते थे. क्यों की शास्त्र मर्यादा है की भगवान की पूजा अथवा कोई अनुष्ठान करते समय न तो बीच में से उठा जा सकता है न ही किसी से बात की जा सकती है. वो चाहते तो अपनी माया से कमल के पुष्पों का ढेर थाल में प्रकट कर लेते किन्तु इस समय वो भगवान नहीं बल्कि अपने इष्ट के भक्त के रूप में थे. अतः वो अपनी शक्तियों का उपयोग अपनी भक्ति में नहीं करना चाहते थे. नारायण ने सोचा लोग मुझे कमल नयन बोलते है. और तब नारायण ने अपनी एक आँख शरीर से निकालकार शिव जी को कमल पुष्प की तरह अर्पित कर दी. और अपना अनुष्ठान पूरा किया. नारायण का इतना समर्पण देखकर शिव जी बहुत प्रसन्न हुए, उनके नेत्रों से प्रेमाश्रु निकल पड़े . इतना ही नहीं, नारायण के इस त्याग से शिव जी मन से ही नहीं बल्कि शरीर से भी पिघल गए. और चक्र रूप में परिणित हो गए. ये वही चक्र है जो नारायण हमेशा धारण किये रहते है. तब से नारायण वही चक्र अपने दाहिने हाथ की तर्जनी में धारण करते है. और इस तरह नारायण और शिव हमेशा एक दूसरे के साथ रहते है. .

  • आपने movies में कोई ऐसा scene ज़रूर देखा होगा जिसमे hero jail से भागने…

    आपने movies में कोई ऐसा scene ज़रूर देखा होगा जिसमे hero jail से भागने के लिए एक सुरंग बनाता है और finally उस जेल से फरार हो जाता है. काफी exciting होता है ये, नहीं! पर आज मैं आपको खुद यही काम करने के लिए कह रहा हूँ …मैं आपको एक सुरंग बनाने के लिए कह रहा हूँ..क्योकि आप भी अपनी life के hero हैं और unfortunately एक virtual jail में क़ैद हैं …एक ऐसी जेल जिसमे जाने से पहले आपको पता भी नहीं था की वो एक जेल है….. आप किसी ऐसी job, business या काम में फंस चुके हैं जो आपको बिलकुल पसंद नहीं है …कभी कभी तो आप frustrated feel करते हैं …क्योंकि आप यहाँ वो नहीं कर रहे होते जो आप सबसे अच्छे ढंग से कर सकते हैं…आप खुद इसे छोड़ना भी चाहते हैं लेकिन financial obligations की वजह से छोड़ नहीं पाते.. मत accept करिए इस condition को, अपनी सुरंग बनाना शुरू करिए …अपने दिल का काम शुरू करिए …अगर नहीं पता कि वो क्या है तो उसे तलाशिये ….पर उस काम को ज़िन्दगी भर मत करिए जिसे आप पसंद नहीं करते …. जो आपको mediocre बनाता है. इस बात को हमेशा याद रखिये कि – जिस चीज को आप चाहते हैं उसमे असफल होना जिस चीज को आप नहीं चाहते उसमे सफल होने से बेहतर है. कैसे बनाएं सुरंग ? कैसे से ज्यादा ज़रूरी है की क्यों बनाएं … जेल में बहुत से कैदी होते हैं पर हीरो ही सुरंग क्यों बना पाता है, क्योंकि उसके सामने एक motive होता है, ये motive ही उसे इतना कठिन काम करने की inspiration देता है …आपका motive क्या है ??…क्या already आपके दिमाग में वो चीज है जो आप current job/ work को छोड़ कर करना चाहते हैं ? …अगर नहीं है तो इस बारे में सोचना बेकार है, ऐसे में अगर आप सुरंग बनाने में कामयाब हो भी जाते हैं तो पता है वो कहाँ निकलेगी ??? एक दूसरी जेल में!! तो अगर आपको लगता है कि आप किसी जेल में बंद हैं तो सबसे पहले आपको जानना होगा कि यहाँ से निकल कर आप करना क्या चाहते हैं, what is that excites you, किस चीज को लेकर आप passionate हैं? ये कैसे पता करें ? I really don’t know. पर मैंने कैसे किया ये आपको बता सकता हूँ. ACT करके. Friends, most of us कभी न कभी किसी चीज को लेकर excited होते हैं …सपने बुनने लगते हैं …आपने लोगों को कहते सुना या खुद भी कहा होगा, “ मैं एक restaurant शुरू करने वाला हूँ ”, “ मैं एक xyz company डालने वाला हूँ …”, etc..but most of the people just talk, they don’t act. अगर आपको अपना passion जानना है तो ACT करना.

  • सक्सेस पानी है तो तोड़िए कम्फर्ट जोन की जंजीरें!

    सक्सेस पानी है तो तोड़िए कम्फर्ट जोन की जंजीरें! एक कप चाय, मौसम के अनुरूप गर्म या ठंडा कमरा, आरामदेह बिस्तर और कानों में धीमा संगीत। क्या इससे बेहतर जिन्दगी हो सकती है। यकीनन आप का उत्तर होगा, “नहीं”। अब एक मिनट ठहरिये और सोचिये… अगर हेमशा ऐसा ही रहे तो क्या इससे बद्तर जिंदगी हो सकती है। यकीनन इस बार भी आप का उत्तर होगा, “नहीं” । थोड़ी देर के लिए तो यह सब अच्छा लगता है। पर अगर ऐसे ही रहना पड़े तो यह बहुत दर्दनाक है। क्यों है ना ? हाँ, क्योंकि इस जिंदगी में कोई विकास नहीं है, कोई संभावना नहीं है, कोई ऐडवेंचर नहीं है। याद है जब हम लोग बचपन में अपने मम्मी – पापा की अँगुली पकड़ कर मेला देखने जाते थे तो रोलर कोस्टर में चढने में बहुत मजा आता था। कभी ऊपर, बहुत ऊपर तो कभी नीचे बहुत नीचे। वो मजा जमीन पर एकसमान चलने में कहाँ। पर बड़े होते ही हम अपने को कटघरे में बंद करना शुरू कर देते हैं- हमसे ये नहीं हो सकता, हमसे वो नहीं हो सकता। फिर मोनोटोनस जिन्दगी से ऊब कर खामखाँ में ईश्वर को दोष देते रहते हैं। उसने पड़ोसी को सब कुछ दिया है पर हमारे भाग्य में… ? आपने ये कहावत सुनी होगी, “ऊपर वाला जब भी देता है छप्पर फाड़ कर देता है। ” लेकिन जरा सोचिये कि अगर आप का छप्पर ही छोटा हो तो बेचारे ईश्वर भी क्या कर पायेंगे। यहाँ छप्पर से मेरा तात्पर्य झोपड़ी या महल की छत से नहीं है बल्कि सोच से है। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर आप छोटा सोचते हैं या किसी भी बदलाव से इंकार करते हैं तो आप जीवन में तरक्की नहीं कर पायेंगे। कहा भी गया है कि “change is the only constant.. केवल परिवर्तन ही अपरिवर्तनशील है “। फिर भी कई लोग बातें तो बड़ी -बड़ी करेंगें पर अपने जीवन में परिवर्तन जरा सा भी स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसे लोग नयी परिस्तिथियों को स्वीकार न कर पाने की वजह से आने वाले हर मौके को गँवा देते हैं। फिर निराशा और अवसाद से घिर जाते हैं। कभी सोचा है, क्यों होता हैं ऐसा ? इसके पीछे बस एक ही कारण है उनका कम्फर्ट जोन .

  • रिक्शेवाले का बेटा बना IAS officer !

    अगर career के point of view से देखा जाए तो India में थ्री आइज़ (3 Is) का कोई मुकाबला नही: IIT,IIM, और IAS. लेकिन इन तीनो में IAS का रुतबा सबसे अधिक है । हर साल लाखों परीक्षार्थी IAS officer बनने की चाह में Civil Services के exam में बैठते हैं पर इनमे से 0.025 percent से भी कम लोग IAS officer बन पाते हैं । आप आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि IAS beat करना कितना मुश्किल काम है , और ऐसे में जो कोई भी इस exam को clear करता है उसके लिए अपने आप ही मन में एक अलग image बन जाती है । और जब ऐसा करने वाला किसी बहुत ही साधारण background से हो तो उसके लिए मन में और भी respect आना स्वाभाविक है। ये कहानी है Govind Jaiswal की , गोविन्द के पिता एक रिक्शा -चालक थे , बनारस की तंग गलियों में , एक 12 by 8 के किराए के कमरे में रहने वाला गोविन्द का परिवार बड़ी मुश्किल से अपना गुजरा कर पाता था । ऊपर से ये कमरा ऐसी जगह था जहाँ शोर -गुल की कोई कमी नहीं थी , अगल-बगल मौजूद फक्ट्रियों और जनरेटरों के शोर में एक दूसरे से बात करना भी मुश्किल था। नहाने -धोने से लेकर खाने -पीने तक का सारा काम इसी छोटी सी जगह में Govind, उनके माता -पिता और दो बहने करती थीं । पर ऐसी परिस्थिति में भी गोविन्द ने शुरू से पढाई पर पूरा ध्यान दिया। अपनी पढाई और किताबों का खर्चा निकालने के लिए वो class 8 से ही tuition पढ़ाने लगे । बचपन से एक असैक्षिक माहौल में रहने वाले गोविन्द को पढाई लिखाई करने पर लोगों के ताने सुनने पड़ते थे । “ चाहे तुम जितना पढ़ लो चलाना तो रिक्शा ही है ” पर गोविन्द इन सब के बावजूद पढाई में जुटे रहते । उनका कहना है- मुझे divert करना असंभव था ।अगर कोई मुझे demoralize करता तो मैं अपनी struggling family के बारे में सोचने लगता। आस – पास के शोर से बचने के लिए वो अपने कानो में रुई लगा लेते , और ऐसे वक़्त जब disturbance ज्यादा होती तब Maths लगाते , और जब कुछ शांती होती तो अन्य subjects पढ़ते ।रात में पढाई के लिए अक्सर उन्हें मोमबत्ती, ढेबरी, इत्यादि का सहारा लेना पड़ता क्योंकि उनके इलाके में १२-१४ घंटे बिजली कटौती रहती। चूँकि वो शुरू से school topper रहे थे और Science subjects में काफी तेज थे इसलिए Class 12 के बाद कई लोगों ने उन्हें Engineering करने की सलाह दी ,। उनके मन में भी एक बार यह विचार आया , लेकिन जब पता चला की Application form की fees ही 500 रुपये है तो उन्होंने ये idea drop कर दिया.

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